और हँस के बुलाते है उसे- वैश्या" |
दोपहर के ढ़ाई बजे, उस तीखी धूप में,
पहने लाल साड़ी और कानो में प्यारी सी झुमकी,
आज गई थी वह उस बाज़ार में एक बार फिर
जहाँ बेचा था उसने अपने हाथों से ही
किसी और को क्या? अपने आप को!
फिर एक और बार मिली थी उस बाज़ार में उसे
कुछ ऐसी ही सखियाँ उसकी,
जो खुद न बन पाई थी किसी की माँ या बहन!
उसके ही जैसे जो, जूझ रही थी नीलामी की आग में ऐसे,
बिन लौ की आग भड़कती हो जैसे |
कोयले सी काली थी वह रात जिसमे,
थमा दिया था उसने अपने जिस्म को
उनके रात-से काले हाथों में ऐसे,
मानो टूटी-सी मिट्टी की गुड़िया हो जैसे |
मन भर खिलवाड़ किया था उसका
और फिर, बिन शर्म ही पूछ लिया था उससे
"कितना ही कीमत है तेरा?'
न औरत होने की शर्म थी,
न जिस्म लुटाने की लज्जा |
उसका भी सर न झुका था माँगते हुए
वह दाम जिसपे रखा था उसने
अपने भीगा-सा तन को भाड़े पे |
"तो क्या अगर लगाई है अपने जिस्म की नीलामी?
भीक तो नहीं माँगी तेरे पैसों की!"
सोचा था उसने |
आज छनक रही थी उसके पैरो में चांदी की पायल |
कानो में थे लाल झुमके, गले में मोती की हार |
थी कजरारी आँखों में चमक,
मन था मस्ताना, थी चाल में ढाल |
आखिर छोड़ दिया था उसने वह पुराना पेशा |
आज माँ थी वह दो बच्चो की,
अंग्रेजी पाठशाला जाते थे जो |
आज थी उसके कंधो में गृहस्थ ज़िम्मेदारियाँ |
मिला था उसी बाज़ार में ही उसको,
उसके दो बच्चो का बाप |
मगर मिट्टी की नहीं, उसने देखा था उसको ऐसे
मानो हो वह सोने की गुड़िया |
आया तो था जिस्म खरीदने ही मगर
अनजाने में कर गया एक दिल का सौदा |
बांध गया जो शादी के अटूट बंधन में ऐसे,
किया रिश्ता हो परियों की रानी से जैसे |
Monday, January 3, 2011
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you wrote dis on ur own?
ReplyDeletebeautiful thought i must say!!
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