Wednesday, November 11, 2009

नारी व्यथा





दर्द को तो आदमी ऐसे लेते है, मानो कोई बनावटी दंड हो,
मगर औरत उसे प्राकृतिक संपत्ति मान के सह लेती है |


यह व्यथा प्रारम्भ होती है उसके जन्म के साथ,
उसका रोना सुनते ही छा जाती है गम की रात |
फोड़ दिए जाते है हर्ष के गुब्बारे,
बुझा दिए जाते है प्रसन्नता के दिए सारे |

मनुष्य सोचता है- उसे झेलने वाला केवल दाता है,
अतः उसे मारने का प्रयास किया जाता है |
पूछोगे तुम, "किसलिए?"
लड़की है वह, सिर्फ इसलिए |

जैसे ही मनुष्य अपना विवेक खोता है,
कहानी का दूसरा शरण शुरू होता है |
"मुझे भी पढना है", जब उसने कहा,
थमा दी गयी गृहस्थी, खिलौने देने थे जहा |

आगे सुनो, उसे क्या क्या सहना पड़ा,
पहाड़ी बाधायों से उसे कैसे लड़ना पड़ा |
जल्द ही पिता को लगने लगी वह बोझ,
पढने की थी उम्र, परन्तु लिया उसके लिए लड़का खोज |

किन्तु वहां पर भी उसे सुकून कहाँ,
ओह! दहेज़ ने जला दिया वहाँ |
अरे! यह व्यथा तो चली आई है,
सदियों से इस तरह अन्धकार ही लायी है |

कभी उसे जलाया, कभी मरवा दिया,
मोल, उसके हे मानव! तुमने भुला दिया |
नारी ने तेरे जीवन में, कितने पात्र अदा किये,
माँ, बेटी, बहन, पत्नी के रूप में संग तेरे दुःख सहे |

हे मानव! नारी तो एक दीपक है,
जला कर खुद को, रौशनी औरों को देती है |
और तू है जो इसे बुझाने का प्रयास कर रहा है |
अरे मुर्ख! तू अपने जीवन में ही खुद दुःख ला रहा है |

पहचान,इस हीरे का मोल, नहीं तो तू पछतायेगा,
हाथ में आये खजाने को भी, तू पा न पायेगा |

1 comment:

  1. are kya baat..!! tu to hindi mein bhi utna hi acha likhti hai jitna angrezi mein.. masha-allah..!! wah wah..!!

    ReplyDelete

 
Creative Commons License
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-Noncommercial-No Derivative Works 2.5 India License.